Thursday, 14 August 2025

गृहिणी का संघर्ष



मैं एक गृहिणी  हूँ, जीवन की राहों में थकी,  

समर्पण की आग में अपने आपको भस्म करती।  

बीमार पड़ जाने को मेरी नीचता कह दिया गया,  

पर मेरी थकान, मेरा हर आँसू, मेरी शक्ति का हिस्सा है।  


अपनी खुशियों को भूलाकर, अपने सपनों को खोकर,  

मैंने घर और परिवार की लौ जलाए रखी।  

तानों और उपदेशों के बीच, मेरा संघर्ष चलता रहा,  

मेरे त्याग की गूँज केवल मेरे भीतर ही गूँजती रही।  


वो कहते हैं — तुम करती ही क्या हो, किसी काबिल नहीं हो। 

पर मैं जानती हूँ — मेरा धैर्य, मेरा समर्पण कितना है।

मेरी पहचान इन सब शब्दों और व्यवहारों से परे है।  


मैं थकती हूँ, मैं बीमार होती हूँ, मैं रोती भी हूँ,  

पर मैं नारी हूँ — और मेरी आत्मा कभी हार नहीं मानती।  

यह मेरी कहानी है, मेरा संघर्ष है,  

और मैं अपने भीतर की शक्ति से हर क्षण उभरती हूँ।


Wednesday, 13 August 2025

शुक्रिया इंग्लिश मीडियम

 (एक माँ की व्यंग्यात्मक गाथा)


शुक्र है भगवान का,

थोड़ा सा दमख़म था जेब में,

थोड़ी सी हिम्मत बची थी रगों में,

भेज दिया बच्चे को इंग्लिश मीडियम में।


अब वो 'You always do this!' चिल्लाती है,

'You don't understand this!' दोहराती है,

और मैं...

बैठी हूं तजुर्बे और संस्कार के ढेर पर —

शब्दों की गोली नहीं लगती सीने पर।


'Shut the door while leaving!' जब कहती है वो,

तो "बाहर निकल जा, माँ!" जैसा दर्द

थोड़ा हल्का हो जाता है,

गूंज कम सुनाई देती है

उस विदेशी लहजे की लहर में।


अब वो ताने कसती है -

"Oh, you're not just playing oblivious, are you?"

और मैं मन ही मन मुस्कुराती हूँ,

कि ‘बेटा बढ़िया टोन पकड़ ली है!’

‘ग्रामर तो फिट बैठ रही है!’


अगर यही सब हिंदी में सुनती,

"तुम अनजान होने का नाटक कर रही हो!"

"तुम समझती ही क्या हो?"

तो शायद…

सीना छलनी हो जाता,

जैसे बाण लगे हों मर्म स्थल पर।


इसलिए हाँ,

थैंक्स टू इंग्लिश मीडियम!

अब डिक्शनरी निकाल लेती हूं

गालियों के बाद,

और तौलती हूँ –

क्या कहा, कैसे कहा,

कितना समझा…

और कितना "इग्नोर" किया जा सकता है।


इसीलिए जब वो

"I don't want to eat this!" कहती है,

मैं "कुछ और बना दूँ?" पूछ लेती हूँ

और जब वो “You intentionally mess with my food !" कहती है,

मैं सोचती हूं –

चलो, भावनाएं अभी भी जिंदा हैं।


कभी-कभी भाषा की दीवार,

दिल को बचा लेती है।

इंग्लिश में ये चोटें”

हिंदी जितनी गहरी नहीं लगतीं।

आँचल की आग ✒️

 जिस दीप को आँचल की छाँव में

थाम लिया था तूफ़ानों से,

उसी ने आज हवाओं से हाथ मिलाया है,

और मुझे ही भस्म करने को भभक आया है।


मैंने सींचा था उसको अपनी साँसों से,

नींदें गवां दीं, सपने समर्पित किए,

हर काँटे को हटाया, हर राह को संवारा,

पर आज वो मेरी जड़ें ही काटने चली है।


मेरा आँचल — जो कभी उसका आसमान था,

अब उसके लिए एक बोझिल परिधान है।

वो पौधा जिसे ममता ने गढ़ा था,

आज कंटीली झाड़ी बन मेरे आंचल को तार तार कर रही है।


माँ का वजूद अब सवालों में है,

ममता की मूरत अब जलती मशालों में है।

कहाँ गया वो स्पर्श, वो मासूमियत का रंग?

अब आँचल में चुभते हैं सिर्फ़ उलाहनों के तंज।


पर मैं माँ हूँ — फिर भी जलकर भी

राख से भी आशीष देती हूँ।

अपने आँचल की आख़िरी कोर से भी

तेरे लिए दुआएं बुनती हूँ।


🕊️

यह सिर्फ़ मेरी नहीं,

हर उस माँ की वेदना है

जो अपने आँचल को ही

भभकती आग बनते देख रही है।

ममता ने क्या पाप किया?

 जिसे मैंने नाज़ों से पाला,

अपने आँचल की छांव में पाला,

हर साँस में बस उसकी खुशी चाही,

उसके सपनों में अपनी दुनिया बाँधी।


ना कोई गिला, ना कोई मोल रखा,

बस उसके लिए अपना सब कुछ खोला रखा।

धूप में छाँव बनी, दीया बनी अंधेरों में,

वो हरपल रही मेरे भीतर, मेरे सवेरे-शामों में।


हमारे बीच जो था, वो शब्दों से परे था,

सिर्फ एक माँ-बेटी का नहीं, युगों का संबंध था।

मैंने पूजा उसे, अपने जीवन से भी बढ़कर,

उसने भी मुझे चाहा अपने मनमंदिर में रखकर।


फिर किस राह ने हमें जुदा किया?

किस दृष्टि ने हमारी दुनिया को भटका दिया?

अब क्यों वो आँखें तिरस्कार से भरी हैं?

क्यों उसकी बातें कटाक्ष से भरी हैं?


वो जो मेरी आत्मा का अंश थी कभी,

अब क्यों मुझे अधम समझती है वही?

ममता के मंदिर में जो दीप जलाए थे,🪔

अब क्यों ज्वाला बन मेरे आंचल को जलाने आए हैं?🔥


हे प्रभु! अगर ममता का यही अंत है,

तो फिर कोई माँ क्यों हर साँस उसे समर्पित करे?

क्यों अपने स्वप्न, अपनी देह, अपने दिन-रात लुटाए,

अगर अंत में उसे उपेक्षा ही मिल पाए?


क्या मैंने गलती की कि संपूर्ण समर्पण कर दिया?

क्या अपने जीवन को उसके लिए उत्सर्ग कर दिया?


तेरी सृष्टि में कोई तो न्याय की बात करे,⚖️

कोई तो बताए — ममता ने क्या पाप किया?

मेरी मेहनत, किसी और का नाम

 अपने नन्हे हाथों से बीज बोए थे,  

रातों की नींदें कुर्बान की थीं,  

कापियों में सिर्फ बच्चों के अक्षर नहीं,  

अपने सपनों की इबारत लिखी थी।  


हर ईंट, हर रंग, हर दरवाज़ा,  

मेरी धड़कनों की गूंज लिए खड़ा था,  

वो सिर्फ एक स्कूल नहीं था,  

मेरे वजूद का हिस्सा था।  


पर रिश्तों के नाम पर सौदे हुए,  

समर्पण और मेहनत के पन्ने फाड़ दिए गए,  

कभी माँ के नाम, कभी भाई के हक में,  

मेरी मेहनत पर किसी और की मोहर लग गई।  


मेरे पास ना दस्तावेज़ रहे,  

ना दावे की आवाज़,  

सिर्फ यादें रहीं —  

और सीने पर लोटते हुए सांप।  


पर आज मैं जान गई हूँ —  

मेरे सपनों की असली ज़मीन  

किसी कागज़ पर दर्ज नहीं,  

वो मेरे अंदर है।  


और अब जो मैं बनाऊँगी,  

वो कोई मुझसे छीन नहीं पाएगा।

बेगानी कर दी गई


जिस आंगन में मेरे पाँव के निशान थे,  

जिन दीवारों में मेरी सांसें कैद थीं,  

वहीं एक दिन दरवाज़ा बंद कर दिया गया,  

कह दिया — ये तुम्हारा नहीं है।  


मैंने किताबों के पन्नों में अपनी रातें बुन दी थीं,  

पर नाम के पन्ने से मेरा नाम मिटा दिया गया,  

और मैं खड़ी रह गई…  

अपने ही घर से, बेगानी होकर। 

🌙 रात की शांति में

 हे ईश्वर,

आज का बोझ मैं आपके हाथों में रखती हूँ।

मेरे दिल की सारी थकान, सारे आँसू,

अब आपके आँगन में सुरक्षित हैं।


मेरे चारों ओर आपकी शांति है,

जैसे माँ की गोद का स्पर्श।

आप मेरे सपनों के पहरेदार हैं,

और मैं नन्हीं बच्ची बनकर सो रही हूँ।


मेरी हर साँस के साथ, मेरी चिंताएँ

समुद्र में लहरों की तरह दूर चली जाएँ।

मैं विश्राम में हूँ।

मैं सुरक्षित हूँ।

मैं ईश्वर की बाहों में हूँ।

गृहिणी का संघर्ष

मैं एक गृहिणी  हूँ, जीवन की राहों में थकी,   समर्पण की आग में अपने आपको भस्म करती।   बीमार पड़ जाने को मेरी नीचता कह दिया गया,   पर मेरी थका...