जिसे मैंने नाज़ों से पाला,
अपने आँचल की छांव में पाला,
हर साँस में बस उसकी खुशी चाही,
उसके सपनों में अपनी दुनिया बाँधी।
ना कोई गिला, ना कोई मोल रखा,
बस उसके लिए अपना सब कुछ खोला रखा।
धूप में छाँव बनी, दीया बनी अंधेरों में,
वो हरपल रही मेरे भीतर, मेरे सवेरे-शामों में।
हमारे बीच जो था, वो शब्दों से परे था,
सिर्फ एक माँ-बेटी का नहीं, युगों का संबंध था।
मैंने पूजा उसे, अपने जीवन से भी बढ़कर,
उसने भी मुझे चाहा अपने मनमंदिर में रखकर।
फिर किस राह ने हमें जुदा किया?
किस दृष्टि ने हमारी दुनिया को भटका दिया?
अब क्यों वो आँखें तिरस्कार से भरी हैं?
क्यों उसकी बातें कटाक्ष से भरी हैं?
वो जो मेरी आत्मा का अंश थी कभी,
अब क्यों मुझे अधम समझती है वही?
ममता के मंदिर में जो दीप जलाए थे,🪔
अब क्यों ज्वाला बन मेरे आंचल को जलाने आए हैं?🔥
हे प्रभु! अगर ममता का यही अंत है,
तो फिर कोई माँ क्यों हर साँस उसे समर्पित करे?
क्यों अपने स्वप्न, अपनी देह, अपने दिन-रात लुटाए,
अगर अंत में उसे उपेक्षा ही मिल पाए?
क्या मैंने गलती की कि संपूर्ण समर्पण कर दिया?
क्या अपने जीवन को उसके लिए उत्सर्ग कर दिया?
तेरी सृष्टि में कोई तो न्याय की बात करे,⚖️
कोई तो बताए — ममता ने क्या पाप किया?
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