जिस दीप को आँचल की छाँव में
थाम लिया था तूफ़ानों से,
उसी ने आज हवाओं से हाथ मिलाया है,
और मुझे ही भस्म करने को भभक आया है।
मैंने सींचा था उसको अपनी साँसों से,
नींदें गवां दीं, सपने समर्पित किए,
हर काँटे को हटाया, हर राह को संवारा,
पर आज वो मेरी जड़ें ही काटने चली है।
मेरा आँचल — जो कभी उसका आसमान था,
अब उसके लिए एक बोझिल परिधान है।
वो पौधा जिसे ममता ने गढ़ा था,
आज कंटीली झाड़ी बन मेरे आंचल को तार तार कर रही है।
माँ का वजूद अब सवालों में है,
ममता की मूरत अब जलती मशालों में है।
कहाँ गया वो स्पर्श, वो मासूमियत का रंग?
अब आँचल में चुभते हैं सिर्फ़ उलाहनों के तंज।
पर मैं माँ हूँ — फिर भी जलकर भी
राख से भी आशीष देती हूँ।
अपने आँचल की आख़िरी कोर से भी
तेरे लिए दुआएं बुनती हूँ।
🕊️
यह सिर्फ़ मेरी नहीं,
हर उस माँ की वेदना है
जो अपने आँचल को ही
भभकती आग बनते देख रही है।
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