मैं एक गृहिणी हूँ, जीवन की राहों में थकी,
समर्पण की आग में अपने आपको भस्म करती।
बीमार पड़ जाने को मेरी नीचता कह दिया गया,
पर मेरी थकान, मेरा हर आँसू, मेरी शक्ति का हिस्सा है।
अपनी खुशियों को भूलाकर, अपने सपनों को खोकर,
मैंने घर और परिवार की लौ जलाए रखी।
तानों और उपदेशों के बीच, मेरा संघर्ष चलता रहा,
मेरे त्याग की गूँज केवल मेरे भीतर ही गूँजती रही।
वो कहते हैं — तुम करती ही क्या हो, किसी काबिल नहीं हो।
पर मैं जानती हूँ — मेरा धैर्य, मेरा समर्पण कितना है।
मेरी पहचान इन सब शब्दों और व्यवहारों से परे है।
मैं थकती हूँ, मैं बीमार होती हूँ, मैं रोती भी हूँ,
पर मैं नारी हूँ — और मेरी आत्मा कभी हार नहीं मानती।
यह मेरी कहानी है, मेरा संघर्ष है,
और मैं अपने भीतर की शक्ति से हर क्षण उभरती हूँ।