Wednesday, 13 August 2025

मेरी मेहनत, किसी और का नाम

 अपने नन्हे हाथों से बीज बोए थे,  

रातों की नींदें कुर्बान की थीं,  

कापियों में सिर्फ बच्चों के अक्षर नहीं,  

अपने सपनों की इबारत लिखी थी।  


हर ईंट, हर रंग, हर दरवाज़ा,  

मेरी धड़कनों की गूंज लिए खड़ा था,  

वो सिर्फ एक स्कूल नहीं था,  

मेरे वजूद का हिस्सा था।  


पर रिश्तों के नाम पर सौदे हुए,  

समर्पण और मेहनत के पन्ने फाड़ दिए गए,  

कभी माँ के नाम, कभी भाई के हक में,  

मेरी मेहनत पर किसी और की मोहर लग गई।  


मेरे पास ना दस्तावेज़ रहे,  

ना दावे की आवाज़,  

सिर्फ यादें रहीं —  

और सीने पर लोटते हुए सांप।  


पर आज मैं जान गई हूँ —  

मेरे सपनों की असली ज़मीन  

किसी कागज़ पर दर्ज नहीं,  

वो मेरे अंदर है।  


और अब जो मैं बनाऊँगी,  

वो कोई मुझसे छीन नहीं पाएगा।

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