जिस आंगन में मेरे पाँव के निशान थे,
जिन दीवारों में मेरी सांसें कैद थीं,
वहीं एक दिन दरवाज़ा बंद कर दिया गया,
कह दिया — ये तुम्हारा नहीं है।
मैंने किताबों के पन्नों में अपनी रातें बुन दी थीं,
पर नाम के पन्ने से मेरा नाम मिटा दिया गया,
और मैं खड़ी रह गई…
अपने ही घर से, बेगानी होकर।
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